समाचार एजेन्सी रायटर्ज़ के अनुसार मार्च में डॉलर अपनी ऊंचाई पर पहुंच गया था लेकिन इस समय वह उक्त निशान से 9 प्वाइंट नीचे है और आशंका व्यक्त की जा रही है कि डॉलर अपने सबसे बुरे स्तर पर दोबारा पहुंच जाएगा जिसके बाद विशेषज्ञों का माना है कि आने वाले कुछ वर्षों तक डॉलर का स्तर नीचे ही रहेगा।
मार्केट में मौजूद अधिकतर विशेषज्ञों और पूंजीनिवेशकों का मानना है कि चुनाव के लिए फ़ेवरेट क़रार दिए जा रहे डेमोक्रेटिक प्रत्याशी जो बाइडन की जीत से करेंसी और भी कमज़ोर होगी क्योंकि वह संभावित रूप से ऐसी नीतियां लाएंगे जिससे डॉलर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे।

इसी तरह कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर डोनल्ड ट्रम्प और 4 साल सत्ता में रहते हैं तो वह डॉलर के लिए सही और स्पष्ट दिशा निर्धारित नहीं कर सकेंगे, अलबत्ता उनकी चीन विरोधी नीतियों से डॉलर की अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मज़बूती और बेहतरी की संभावना मौजूद है।
पिछले महीने रायटर्ज़ के सर्वे के अनुसार विशेषज्ञों ने कहा था कि एक साल में डॉलर के मुक़ाबले में यूरो के 1.21 डॉलर ऊपर जाने की संभावना है जो वर्तमान मार्केट की दर से 4 प्रतिशत अधिक है।
यह कुछ बातें हैं जो लंबे समय में डॉलर की हैसियत पर प्रभाव डाल सकते हैं। गुज़रे कई वर्षों से अन्य विकासशील देशों के मुक़ाबले में अधिक लाभ दर की वजह से डॉलर को मदद मिलती थी क्योंकि यह पूंजीनिवेशकों के लिए अधिक लाभदायक था।
अलबत्ता जारी साल फ़ेडरल रिज़र्व शील्ड की ओर से कोरोना वायरस के आर्थिक प्रभाव से मुक़ाबला करने के लिए इस लाभ दर को कम कर दिया गया जिससे पूंजीनिवेश और डॉलर दोनों प्रभावित हुए और सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि लाभ दर एक समय तक कम रखने का वादा किया गया है।

एक विशेषज्ञ ने कहा है कि सबसे अधिक प्रभाव कोरोना की वजह से कम किए गये लाभ दर से पड़ा है, यह डॉलर के लिए बहुत ही नकारात्मक है और इसकी अस्ल हैसियत से बहुत दूर है।
मुद्रास्फीति में वृद्धि की वजह से बॉन्ड्ज़ पर लाभ शून्य होने की वजह से डॉलर की ओर रुझान में कमी हुई है और लोगों ने वहां से पैसे निकाल कर स्टॉक से सोने तक हर चीज़ में पूंजीनिवेश शुरु कर दिया।
सितम्बर में रायटर्ज़ की ओर से कराए गये एक सर्वे में विशेषज्ञों ने कहा था कि आशा है कि 12 महीने की अवधि में बॉन्ड पर लाभ की दर 0.93 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी जो मुद्रास्फ़ीति के औसत दर के मुक़ाबले में आधी है और इस बात का इशारा करती है कि आने वाले साल में नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे।
एक और विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा कि हम कोई ऐसा दृश्य नहीं देख रहे हैं जिसमें डॉलर की गिरती हुई वैल्यु का रुझान ख़त्म हो सके क्योंकि बान्ड्ज़ पर लाभ शून्य ही रहेगा।

डॉलर के गिरते मूल्य पर लगाई जा रही शर्त में पिछले सप्ताह 26.46 अरब डॉलर का पूंजीनिवेश किया गया जबकि इसके मुक़ाबले में अगस्त में यह 9 साल के सबसे ऊंची दर के साथ 34.07 अरब डॉलर पर थी।
यह डॉलर के चल रहे नकारात्मक प्रभाव को बयान करती है लेकिन दृष्टिकोण के परिवर्तन के परिणाम में पूंजीनिवेशक कोई उल्टा क़दम उठाते हैं तो इस से डॉलर को फ़ायदा पहुंच सकता है।
यह डांवाडोल स्थिति चुनाव जैसे इवेंट पर भी मंडरा रही है जिसमें कुछ का मानना है कि ट्रम्प जीतेंगे और उसके परिणाम में छोटे सहायता पैकेज की घोषणा की जाएगी।

टीडी सिक्युरटीज़ के विशेषज्ञ इससे अलग दृष्टिकोण रखते हैं और उनका मानना है कि ट्रम्प की जीत डॉलर के लिए बहुत हानिकारक होगी और मार्केट का बड़ा वर्ग बाइडन के हक़ में है, मार्केट अब जियोपोलेटिक्ल अविश्वसनीयता और ट्रेड वार को सहन नहीं कर सकती।
ट्रम्प अपने पूरे सत्ताकाल में मज़बूत डॉलर के धुर विरोधी रहे हैं क्योंकि उनके अनुसार इससे कुछ राष्ट्रों को व्यापार में अवैध सीमा तक प्रतिस्पर्धा में फ़ायदा होता है।
इस बात की आशा की जा रही है कि बाइडन के शासन काल में वित्तीय वर्ष के दौरान ख़र्चों से डॉलर को मज़बूती मिलेगी लेकिन साथ ही साथ कुछ विशेषज्ञों को आशंका है कि डेमोक्रेट्स की विदेश नीति के डॉलर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।